श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.14.5

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

ततो धर्मं चतुष्पादं मनवो हरिणोदिताः।

युक्ताः सञ्चारयन्त्यद्धा स्वे स्वे काले महीं नृप॥ ५

tato dharmaṃ catuṣpādaṃ manavo hariṇoditāḥ|

yuktāḥ sañcārayantyaddhā sve sve kāle mahīṃ nṛpa|| 5

अर्थ

राजन्! भगवान्‌की प्रेरणासे अपने-अपने मन्वन्तरमें बड़ी सावधानीसे सब-के-सब मनु पृथ्वीपर चारों चरणसे परिपूर्ण धर्मका अनुष्ठान करवाते हैं॥ ५॥✎ 744 745 746

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #744 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #745 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #746 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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