॥ श्रीहरिः ॥
ततो धर्मं चतुष्पादं मनवो हरिणोदिताः।
युक्ताः सञ्चारयन्त्यद्धा स्वे स्वे काले महीं नृप॥ ५
tato dharmaṃ catuṣpādaṃ manavo hariṇoditāḥ|
yuktāḥ sañcārayantyaddhā sve sve kāle mahīṃ nṛpa|| 5
अर्थ
राजन्! भगवान्की प्रेरणासे अपने-अपने मन्वन्तरमें बड़ी सावधानीसे सब-के-सब मनु पृथ्वीपर चारों चरणसे परिपूर्ण धर्मका अनुष्ठान करवाते हैं॥ ५॥✎ 744 745 746
ततो धर्मं चतुष्पादं मनवो हरिणोदिताः।
युक्ताः सञ्चारयन्त्यद्धा स्वे स्वे काले महीं नृप॥ ५
राजन्! भगवान्की प्रेरणासे अपने-अपने मन्वन्तरमें बड़ी सावधानीसे सब-के-सब मनु पृथ्वीपर चारों चरणसे परिपूर्ण धर्मका अनुष्ठान करवाते हैं॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.14.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 973) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/14/5/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
- #744 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की
- #745 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की
- #746 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की