श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.15.22

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

यां न व्रजन्त्यधर्मिष्ठाः खला भूतद्रुहः शठाः।

मानिनः कामिनो लुब्धा एभिर्हीना व्रजन्ति यत्॥ २२

yāṃ na vrajantyadharmiṣṭhāḥ khalā bhūtadruhaḥ śaṭhāḥ|

māninaḥ kāmino lubdhā ebhirhīnā vrajanti yat|| 22

अर्थ

उस पुरीमें अधर्मी, दुष्ट, जीवद्रोही, ठग, मानी, कामी और लोभी नहीं जा सकते। जो इन दोषोंसे रहित हैं, वे ही वहाँ जाते हैं॥ २२॥✎ 1971

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1971 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): सौगन्धित → सौगन्धिक

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें