श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.16.27

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

त्वं देव्यादिवराहेण रसायाः स्थानमिच्छता।

उद‍्धृतासि नमस्तुभ्यं पाप्मानं मे प्रणाशय॥ २७

tvaṃ devyādivarāheṇa rasāyāḥ sthānamicchatā|

uddhṛtāsi namastubhyaṃ pāpmānaṃ me praṇāśaya|| 27

अर्थ

हे देवि! प्राणियोंको स्थान देनेकी इच्छासे वराहभगवान्‌ने रसातलसे तुम्हारा उद्धार किया था। तुम्हें मेरा नमस्कार है। तुम मेरे पापोंको नष्ट कर दो॥ २७॥✎ 752 753

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #752 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #753 शब्दोंके बीचका स्थान: वराहभगवान् ने → वराहभगवान्‌ने

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