॥ श्रीहरिः ॥
कृत्वा शिरसि तच्छेषां देवमुद्वासयेत् ततः।
द्व्यवरान्भोजयेद् विप्रान्पायसेन यथोचितम्॥ ४३
kṛtvā śirasi taccheṣāṃ devamudvāsayet tataḥ|
dvyavarānbhojayed viprānpāyasena yathocitam|| 43
अर्थ
निर्माल्यको सिरसे लगाकर देवताका विसर्जन करे। कम-से-कम दो ब्राह्मणोंको यथोचित रीतिसे खीरका भोजन करावे॥ ४३॥✎ 754 755
कृत्वा शिरसि तच्छेषां देवमुद्वासयेत् ततः।
द्व्यवरान्भोजयेद् विप्रान्पायसेन यथोचितम्॥ ४३
निर्माल्यको सिरसे लगाकर देवताका विसर्जन करे। कम-से-कम दो ब्राह्मणोंको यथोचित रीतिसे खीरका भोजन करावे॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.16.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 982) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/16/43/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
- #754 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की
- #755 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्को