श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.16.51

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

पूजां च महतीं कुर्याद् वित्तशाठ्यविवर्जितः।

चरुं निरूप्य पयसि शिपिविष्टाय विष्णवे॥ ५१

pūjāṃ ca mahatīṃ kuryād vittaśāṭhyavivarjitaḥ|

caruṃ nirūpya payasi śipiviṣṭāya viṣṇave|| 51

अर्थ

उस दिन धनका संकोच छोड़कर भगवान्‌की बहुत बड़ी पूजा करनी चाहिये और दूधमें चरु (खीर) पकाकर विष्णुभगवान्‌को अर्पित करना चाहिये॥ ५१॥✎ 761 762

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #761 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णुभगवान् को → विष्णुभगवान्‌को
  • #762 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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