श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.16.58

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

एतत्पयोव्रतं नाम पुरुषाराधनं परम्।

पितामहेनाभिहितं मया४ ते समुदाहृतम्॥ ५८

etatpayovrataṃ nāma puruṣārādhanaṃ param|

pitāmahenābhihitaṃ mayā te samudāhṛtam|| 58

अर्थ

प्रिये! यह भगवान्‌की श्रेष्ठ आराधना है। इसका नाम है ‘पयोव्रत’। ब्रह्माजीने मुझे जैसा बताया था, वैसा ही मैंने तुम्हें बता दिया॥ ५८॥✎ 766

टिप्पणियाँ

  1. ४

    प्रा० पा०—मम।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 984)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #766 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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