श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.17.6

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

सोत्थाय बद्धाञ्जलिरीडितुं स्थिता

नोत्सेह आनन्दजलाकुलेक्षणा।

बभूव तूष्णीं पुलकाकुलाकृति-

स्तद्दर्शनात्युत्सवगात्रवेपथुः ॥ ६

sotthāya baddhāñjalirīḍituṃ sthitā

notseha ānandajalākulekṣaṇā|

babhūva tūṣṇīṃ pulakākulākṛti-

staddarśanātyutsavagātravepathuḥ || 6

अर्थ

फिर उठकर, हाथ जोड़, भगवान्‌की स्तुति करनेकी चेष्टा की; परन्तु नेत्रोंमें आनन्दके आँसू उमड़ आये, उससे बोला न गया। सारा शरीर पुलकित हो रहा था, दर्शनके आनन्दोल्लाससे उसके अंगोंमें कम्प होने लगा था, वह चुपचाप खड़ी रही॥ ६॥✎ 769 770 771 772

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #769 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #770 शब्दोंके बीचका स्थान: यज्ञेश्‍वर-भगवान् को → यज्ञेश्‍वर-भगवान्‌को
  • #771 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #772 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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