श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.18.1

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

अथाष्टादशोऽध्यायः

वामनभगवान्‌का प्रकट होकर राजा बलिकी यज्ञशालामें पधारना

श्रीशुक उवाच

इत्थं विरिञ्चस्तुतकर्मवीर्यः

प्रादुर्बभूवामृतभूरदित्याम् ।

चतुर्भुजः शङ्खगदाब्जचक्रः

पिशङ्गवासा नलिनायतेक्षणः॥ १

itthaṃ viriñcastutakarmavīryaḥ

prādurbabhūvāmṛtabhūradityām |

caturbhujaḥ śaṅkhagadābjacakraḥ

piśaṅgavāsā nalināyatekṣaṇaḥ|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इस प्रकार जब ब्रह्माजीने भगवान्‌की शक्ति और लीलाकी स्तुति की, तब जन्म-मृत्युरहित भगवान् अदितिके सामने प्रकट हुए। भगवान्‌के चार भुजाएँ थीं; उनमें वे शंख, गदा, कमल और चक्र धारण किये हुए थे। कमलके समान कोमल और बड़े-बड़े नेत्र थे। पीताम्बर शोभायमान हो रहा था॥ १॥✎ 777 2036

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #777 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #2036 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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