भगवान्के लघुरूपके अनुरूप सारे अंग छोटे-छोटे बड़े ही मनोरम एवं दर्शनीय थे। उन्हें देखकर बलिको बड़ा आनन्द हुआ और उन्होंने वामनभगवान्को एक उत्तम आसन दिया॥ २६॥✎ 786787788789
यजमानः प्रमुदितो दर्शनीयं मनोरमम्।
रूपानुरूपावयवं तस्मा आसनमाहरत्॥ २६
भगवान्के लघुरूपके अनुरूप सारे अंग छोटे-छोटे बड़े ही मनोरम एवं दर्शनीय थे। उन्हें देखकर बलिको बड़ा आनन्द हुआ और उन्होंने वामनभगवान्को एक उत्तम आसन दिया॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.18.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 991) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/18/26/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
#786 शब्दोंके बीचका स्थान: वामनभगवान् को → वामनभगवान्को