श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.18.3

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

मधुव्रतव्रातविघुष्टया स्वया

विराजितः श्रीवनमालया हरिः।

प्रजापतेर्वेश्मतमः स्वरोचिषा

विनाशयन् कण्ठनिविष्टकौस्तुभः॥ ३

madhuvratavrātavighuṣṭayā svayā

virājitaḥ śrīvanamālayā hariḥ|

prajāpaterveśmatamaḥ svarociṣā

vināśayan kaṇṭhaniviṣṭakaustubhaḥ|| 3

अर्थ

भगवान् गलेमें अपनी स्वरूपभूत वनमाला धारण किये हुए थे, जिसके चारों ओर झुंड-के-झुंड भौंरे गुंजार कर रहे थे। उनके कण्ठमें कौस्तुभमणि सुशोभित थी। भगवान्‌की अंगकान्तिसे प्रजापति कश्यपजीके घरका अन्धकार नष्ट हो गया॥ ३॥✎ 778

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #778 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें