श्रीभगवान्ने कहा—राजन्! संसारके सब-के-सब प्यारे विषय एक मनुष्यकी कामनाओंको भी पूर्ण करनेमें समर्थ नहीं हैं, यदि वह अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाला—सन्तोषी न हो॥ २१॥✎ 794
यावन्तो विषयाः प्रेष्ठास्त्रिलोक्यामजितेन्द्रियम्।
न शक्नुवन्ति ते सर्वे प्रतिपूरयितुं नृप॥ २१
श्रीभगवान्ने कहा—राजन्! संसारके सब-के-सब प्यारे विषय एक मनुष्यकी कामनाओंको भी पूर्ण करनेमें समर्थ नहीं हैं, यदि वह अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाला—सन्तोषी न हो॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.19.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 995) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/19/21/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#794 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने