श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.19.21

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

यावन्तो विषयाः प्रेष्ठास्त्रिलोक्यामजितेन्द्रियम्।

न शक्नुवन्ति ते सर्वे प्रतिपूरयितुं नृप॥ २१

yāvanto viṣayāḥ preṣṭhāstrilokyāmajitendriyam|

na śaknuvanti te sarve pratipūrayituṃ nṛpa|| 21

अर्थ

श्रीभगवान्‌ने कहा—राजन्! संसारके सब-के-सब प्यारे विषय एक मनुष्यकी कामनाओंको भी पूर्ण करनेमें समर्थ नहीं हैं, यदि वह अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाला—सन्तोषी न हो॥ २१॥✎ 794

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #794 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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