श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.19.41

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

पराग् रिक्तमपूर्णं वा अक्षरं यत् तदोमिति।

यत् किञ्चिदोमिति ब्रूयात् तेन रिच्येत वै पुमान्।

भिक्षवे सर्वमोङ्कुर्वन्‍नालं कामेन चात्मने॥ ४१

parāg riktamapūrṇaṃ vā akṣaraṃ yat tadomiti|

yat kiñcidomiti brūyāt tena ricyeta vai pumān|

bhikṣave sarvamoṅkurvannālaṃ kāmena cātmane|| 41

अर्थ

‘हाँ मैं दूँगा’—यह वाक्य ही धनको दूर हटा देता है। इसलिये इसका उच्चारण ही अपूर्ण अर्थात् धनसे खाली कर देनेवाला है। यही कारण है कि जो पुरुष ‘हाँ मैं दूँगा’—ऐसा कहता है, वह धनसे खाली हो जाता है। जो याचकको सब कुछ देना स्वीकार कर लेता है, वह अपने लिये भोगकी कोई सामग्री नहीं रख सकता॥ ४१॥

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