श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.20.14

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

एवमश्रद्धितं शिष्यमनादेशकरं गुरुः।

शशाप दैवप्रहितः सत्यसन्धं मनस्विनम्॥ १४

evamaśraddhitaṃ śiṣyamanādeśakaraṃ guruḥ|

śaśāpa daivaprahitaḥ satyasandhaṃ manasvinam|| 14

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—जब शुक्राचार्यजीने देखा कि मेरा यह शिष्य गुरुके प्रति अश्रद्धालु है तथा मेरी आज्ञाका उल्लंघन कर रहा है, तब दैवकी प्रेरणासे उन्होंने राजा बलिको शाप दे दिया—यद्यपि वे सत्यप्रतिज्ञ और उदार होनेके कारण शापके पात्र नहीं थे॥ १४॥✎ 797

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #797 शब्दोंके बीचका स्थान: वामनभगवान् की → वामनभगवान्‌की

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