श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.20.27

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

वाण्यां च छन्दांसि रसे जलेशं

भ्रुवोर्निषेधं च विधिं च पक्ष्मसु।

अहश्‍च रात्रिं च परस्य पुंसो

मन्युं ललाटेऽधर एव लोभम्॥ २७

vāṇyāṃ ca chandāṃsi rase jaleśaṃ

bhruvorniṣedhaṃ ca vidhiṃ ca pakṣmasu|

ahaśca rātriṃ ca parasya puṃso

manyuṃ lalāṭe'dhara eva lobham|| 27

अर्थ

वाणीमें वेद, रसनामें वरुण, भौंहोंमें विधि और निषेध, पलकोंमें दिन और रात। विश्‍वरूपके ललाटमें क्रोध और नीचेके ओठमें लोभके दर्शन हुए॥ २७॥

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