श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.20.6

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

यद् यद्धास्यति लोकेऽस्मिन्संपरेतं धनादिकम्।

तस्य त्यागे निमित्तं किं विप्रस्तुष्येन्‍न तेन चेत्॥ ६

yad yaddhāsyati loke'sminsaṃparetaṃ dhanādikam|

tasya tyāge nimittaṃ kiṃ viprastuṣyenna tena cet|| 6

अर्थ

इस संसारमें मर जानेके बाद धन आदि जो-जो वस्तुएँ साथ छोड़ देती हैं, यदि उनके द्वारा दान आदिसे ब्राह्मणोंको भी सन्तुष्ट न किया जा सका, तो उनके त्यागका लाभ ही क्या रहा?॥ ६॥

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