sarvasvaṃ no hṛtaṃ bharturnyastadaṇḍasya barhiṣi|| 11
अर्थ
जब हमारे स्वामी यज्ञमें दीक्षित होकर किसीको किसी प्रकारका दण्ड देनेके लिये उपरत हो गये हैं, तब इस शत्रुने ब्रह्मचारीका वेष बनाकर पहले तो याचना की और पीछे हमारा सर्वस्व हरण कर लिया॥ ११॥
अनेन याचमानेन शत्रुणा वटुरूपिणा।
सर्वस्वं नो हृतं भर्तुर्न्यस्तदण्डस्य बर्हिषि॥ ११
जब हमारे स्वामी यज्ञमें दीक्षित होकर किसीको किसी प्रकारका दण्ड देनेके लिये उपरत हो गये हैं, तब इस शत्रुने ब्रह्मचारीका वेष बनाकर पहले तो याचना की और पीछे हमारा सर्वस्व हरण कर लिया॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.21.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 1003) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/21/11/