श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.22.10

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

इत्थं स निश्चित्य पितामहो महा-

नगाधबोधो भवतः पादपद्मम्।

ध्रुवं प्रपेदे ह्यकुतोभयं जनाद्

भीतः स्वपक्षक्षपणस्य सत्तमः॥ १०

itthaṃ sa niścitya pitāmaho mahā-

nagādhabodho bhavataḥ pādapadmam|

dhruvaṃ prapede hyakutobhayaṃ janād

bhītaḥ svapakṣakṣapaṇasya sattamaḥ|| 10

अर्थ

ऐसा निश्‍चय करके मेरे पितामह प्रह्लादजीने, यह जानते हुए भी कि आप लौकिक दृष्टिसे उनके भाई-बन्धुओंके नाश करनेवाले शत्रु हैं, फिर आपके ही भयरहित एवं अविनाशी चरणकमलोंकी शरण ग्रहण की थी। क्यों न हो—वे संसारसे परम विरक्त, अगाध बोधसम्पन्‍न, उदारहृदय एवं संत-शिरोमणि जो हैं॥ १०॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें