श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.22.17

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

यया हि विद्वानपि मुह्यते यत-

स्तत् को विचष्टे गतिमात्मनो यथा।

तस्मै नमस्ते जगदीश्‍वराय वै

नारायणायाखिललोकसाक्षिणे ॥ १७

yayā hi vidvānapi muhyate yata-

stat ko vicaṣṭe gatimātmano yathā|

tasmai namaste jagadīśvarāya vai

nārāyaṇāyākhilalokasākṣiṇe || 17

अर्थ

प्रभो! लक्ष्मीके मदसे तो विद्वान् पुरुष भी मोहित हो जाते हैं। उसके रहते भला, अपने वास्तविक स्वरूपको ठीक-ठीक कौन जान सकता है? अतः उस लक्ष्मीको छीनकर महान् उपकार करनेवाले, समस्त जगत‍्के महान् ईश्‍वर, सबके हृदयमें विराजमान और सबके परम साक्षी श्रीनारायणदेवको मैं नमस्कार करता हूँ॥ १७॥

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