श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.22.29

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

क्षीणरिक्थश्च्युतः१ स्थानात् क्षिप्तो बद्धश्‍च शत्रुभिः।

ज्ञातिभिश्‍च परित्यक्तो यातनामनुयापितः॥ २९

kṣīṇarikthaścyutaḥ sthānāt kṣipto baddhaśca śatrubhiḥ|

jñātibhiśca parityakto yātanāmanuyāpitaḥ|| 29

अर्थ

इसका धन छीन लिया, राजपदसे अलग कर दिया, तरह-तरहके आक्षेप किये, शत्रुओंने बाँध लिया, भाई-बन्धु छोड़कर चले गये, इतनी यातनाएँ भोगनी पड़ीं—यहाँतक कि गुरुदेवने भी इसको डाँटा-फटकारा और शापतक दे दिया। परन्तु इस दृढव्रतीने अपनी प्रतिज्ञा नहीं छोड़ी। मैंने इससे छलभरी बातें कीं, मनमें छल रखकर धर्मका उपदेश किया; परन्तु इस सत्यवादीने अपना धर्म न छोड़ा॥ २९-३०॥

यह अर्थ श्लोक 29–30 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—क्षीणो विध्वंसितः स्था०।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 1010)

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