॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.22.29
क्षीणरिक्थश्च्युतः१ स्थानात् क्षिप्तो बद्धश्च शत्रुभिः।
ज्ञातिभिश्च परित्यक्तो यातनामनुयापितः॥ २९
kṣīṇarikthaścyutaḥ sthānāt kṣipto baddhaśca śatrubhiḥ|
jñātibhiśca parityakto yātanāmanuyāpitaḥ|| 29
अर्थ
इसका धन छीन लिया, राजपदसे अलग कर दिया, तरह-तरहके आक्षेप किये, शत्रुओंने बाँध लिया, भाई-बन्धु छोड़कर चले गये, इतनी यातनाएँ भोगनी पड़ीं—यहाँतक कि गुरुदेवने भी इसको डाँटा-फटकारा और शापतक दे दिया। परन्तु इस दृढव्रतीने अपनी प्रतिज्ञा नहीं छोड़ी। मैंने इससे छलभरी बातें कीं, मनमें छल रखकर धर्मका उपदेश किया; परन्तु इस सत्यवादीने अपना धर्म न छोड़ा॥ २९-३०॥
टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—क्षीणो विध्वंसितः स्था०।