श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.23.11

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

आज्ञां भगवतो राजन् प्रह्रादो बलिना सह।

बाढमित्यमलप्रज्ञो मूर्ध्न्याधाय कृताञ्जलिः॥ ११

ājñāṃ bhagavato rājan prahrādo balinā saha|

bāḍhamityamalaprajño mūrdhnyādhāya kṛtāñjaliḥ|| 11

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! समस्त दैत्यसेनाके स्वामी विशुद्धबुद्धि प्रह्लादजीने ‘जो आज्ञा’ कहकर, हाथ जोड़, भगवान्‌का आदेश मस्तकपर चढ़ाया। फिर उन्होंने बलिके साथ आदिपुरुष भगवान्‌की परिक्रमा की, उन्हें प्रणाम किया और उनसे अनुमति लेकर सुतल लोककी यात्रा की॥ ११-१२॥✎ 822

यह अर्थ श्लोक 11–12 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #822 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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