श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.23.31

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

क्रियमाणे कर्मणीदं दैवे पित्र्येऽथ मानुषे।

यत्र यत्रानुकीर्त्येत तत् तेषां सुकृतं विदुः॥ ३१

kriyamāṇe karmaṇīdaṃ daive pitrye'tha mānuṣe|

yatra yatrānukīrtyeta tat teṣāṃ sukṛtaṃ viduḥ|| 31

अर्थ

देवयज्ञ, पितृयज्ञ और मनुष्ययज्ञ किसी भी कर्मका अनुष्ठान करते समय जहाँ-जहाँ भगवान्‌की इस लीलाका कीर्तन होता है वह कर्म सफलतापूर्वक सम्पन्‍न हो जाता है। यह बड़े-बड़े महात्माओंका अनुभव है॥ ३१॥✎ 829 1630

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामष्टमस्कन्धे
वामनावतारचरिते त्रयोविंशोऽध्यायः
॥ २३॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #829 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1630 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: वामन-भगवान्‌के → वामनभगवान्‌के

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