yatra yatrānukīrtyeta tat teṣāṃ sukṛtaṃ viduḥ|| 31
अर्थ
देवयज्ञ, पितृयज्ञ और मनुष्ययज्ञ किसी भी कर्मका अनुष्ठान करते समय जहाँ-जहाँ भगवान्की इस लीलाका कीर्तन होता है वह कर्म सफलतापूर्वक सम्पन्न हो जाता है। यह बड़े-बड़े महात्माओंका अनुभव है॥ ३१॥✎ 8291630
क्रियमाणे कर्मणीदं दैवे पित्र्येऽथ मानुषे।
यत्र यत्रानुकीर्त्येत तत् तेषां सुकृतं विदुः॥ ३१
देवयज्ञ, पितृयज्ञ और मनुष्ययज्ञ किसी भी कर्मका अनुष्ठान करते समय जहाँ-जहाँ भगवान्की इस लीलाका कीर्तन होता है वह कर्म सफलतापूर्वक सम्पन्न हो जाता है। यह बड़े-बड़े महात्माओंका अनुभव है॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.23.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 1014) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/23/31/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)