श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.24.2

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

यदर्थमदधाद् रूपं मात्स्यं लोकजुगुप्सितम्।

तमःप्रकृति दुर्मर्षं कर्मग्रस्त इवेश्‍वरः॥ २

yadarthamadadhād rūpaṃ mātsyaṃ lokajugupsitam|

tamaḥprakṛti durmarṣaṃ karmagrasta iveśvaraḥ|| 2

अर्थ

भगवन्! मत्स्ययोनि एक तो यों ही लोकनिन्दित है, दूसरे तमोगुणी और असह्य परतन्त्रतासे युक्त भी है। सर्वशक्तिमान् होनेपर भी भगवान्‌ने कर्मबन्धनमें बँधे हुए जीवकी तरह यह मत्स्यका रूप क्यों धारण किया?॥ २॥✎ 830

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #830 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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