श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.24.49

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

न यत्प्रसादायुतभागलेश-

मन्ये च देवा गुरवो जनाः स्वयम्।

कर्तुं समेताः प्रभवन्ति पुंस-

स्तमीश्‍वरं त्वां शरणं प्रपद्ये॥ ४९

na yatprasādāyutabhāgaleśa-

manye ca devā guravo janāḥ svayam|

kartuṃ sametāḥ prabhavanti puṃsa-

stamīśvaraṃ tvāṃ śaraṇaṃ prapadye|| 49

अर्थ

जितने भी देवता, गुरु और संसारके दूसरे जीव हैं—वे सब यदि स्वतन्त्ररूपसे एक साथ मिलकर भी कृपा करें, तो आपकी कृपाके दस हजारवें अंशके अंशकी भी बराबरी नहीं कर सकते। प्रभो! आप ही सर्वशक्तिमान् हैं। मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ॥ ४९॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें