॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.24.5
श्रीशुक उवाच
गोविप्रसुरसाधूनां छन्दसामपि चेश्वरः।
रक्षामिच्छंस्तनूर्धत्ते धर्मस्यार्थस्य चैव हि॥ ५
goviprasurasādhūnāṃ chandasāmapi ceśvaraḥ|
rakṣāmicchaṃstanūrdhatte dharmasyārthasya caiva hi|| 5
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! यों तो भगवान् सबके एकमात्र प्रभु हैं; फिर भी वे गौ, ब्राह्मण, देवता, साधु, वेद, धर्म और अर्थकी रक्षाके लिये शरीर धारण किया करते हैं॥ ५॥✎ 831