गजेन्द्रने कहा—जो जगत्के मूल कारण हैं और सबके हृदयमें पुरुषके रूपमें विराजमान हैं एवं समस्त जगत्के एकमात्र स्वामी हैं, जिनके कारण इस संसारमें चेतनताका विस्तार होता है—उन भगवान्को मैं नमस्कार करता हूँ, प्रेमसे उनका ध्यान करता हूँ॥ २॥✎ 661662
ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम्।
पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि॥ २
गजेन्द्रने कहा—जो जगत्के मूल कारण हैं और सबके हृदयमें पुरुषके रूपमें विराजमान हैं एवं समस्त जगत्के एकमात्र स्वामी हैं, जिनके कारण इस संसारमें चेतनताका विस्तार होता है—उन भगवान्को मैं नमस्कार करता हूँ, प्रेमसे उनका ध्यान करता हूँ॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.3.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 914) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/3/2/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)