जिनके अनन्यप्रेमी भक्तजन उन्हींकी शरणमें रहते हुए उनसे किसी भी वस्तुकी—यहाँतक कि मोक्षकी भी अभिलाषा नहीं करते, केवल उनकी परम दिव्य मंगलमयी लीलाओंका गान करते हुए आनन्दके समुद्रमें निमग्न रहते हैं॥ २०॥
एकान्तिनो यस्य न कञ्चनार्थं
वाञ्छन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः।
अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमङ्गलं
गायन्त आनन्दसमुद्रमग्नाः॥ २०
जिनके अनन्यप्रेमी भक्तजन उन्हींकी शरणमें रहते हुए उनसे किसी भी वस्तुकी—यहाँतक कि मोक्षकी भी अभिलाषा नहीं करते, केवल उनकी परम दिव्य मंगलमयी लीलाओंका गान करते हुए आनन्दके समुद्रमें निमग्न रहते हैं॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.3.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 917) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/3/20/