श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.3.23

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

यथार्चिषोऽग्नेः सवितुर्गभस्तयो

निर्यान्ति संयान्त्यसकृत् स्वरोचिषः।

तथा यतोऽयं गुणसंप्रवाहो

बुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः॥ २३

yathārciṣo'gneḥ saviturgabhastayo

niryānti saṃyāntyasakṛt svarociṣaḥ|

tathā yato'yaṃ guṇasaṃpravāho

buddhirmanaḥ khāni śarīrasargāḥ|| 23

अर्थ

जिनकी अत्यन्त छोटी कलासे अनेकों नाम-रूपके भेद-भावसे युक्त ब्रह्मा आदि देवता, वेद और चराचर लोकोंकी सृष्टि हुई है, जैसे धधकती हुई आगसे लपटें और प्रकाशमान सूर्यसे उनकी किरणें बार-बार निकलती और लीन होती रहती हैं, वैसे ही जिन स्वयंप्रकाश परमात्मासे बुद्धि, मन, इन्द्रिय और शरीर—जो गुणोंके प्रवाहरूप हैं—बार-बार प्रकट होते तथा लीन हो जाते हैं, वे भगवान् न देवता हैं और न असुर। वे मनुष्य और पशु-पक्षी भी नहीं हैं। न वे स्त्री हैं, न पुरुष और न नपुंसक। वे कोई साधारण या असाधारण प्राणी भी नहीं हैं। न वे गुण हैं और न कर्म, न कार्य हैं और न तो कारण ही। सबका निषेध हो जानेपर जो कुछ बचा रहता है, वही उनका स्वरूप है तथा वे ही सब कुछ हैं। वे ही परमात्मा मेरे उद्धारके लिये प्रकट हों॥ २२—२४॥

यह अर्थ श्लोक 22–24 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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