योगीलोग योगके द्वारा कर्म, कर्मवासना और कर्मफलको भस्म करके अपने योगशुद्ध हृदयमें जिन योगेश्वरभगवान्का साक्षात्कार करते हैं—उन प्रभुको मैं नमस्कार करता हूँ॥ २७॥
योगरन्धितकर्माणो हृदि योगविभाविते।
योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोऽस्म्यहम्॥ २७
योगीलोग योगके द्वारा कर्म, कर्मवासना और कर्मफलको भस्म करके अपने योगशुद्ध हृदयमें जिन योगेश्वरभगवान्का साक्षात्कार करते हैं—उन प्रभुको मैं नमस्कार करता हूँ॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.3.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 918) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/3/27/