सरोवरके भीतर बलवान् ग्राहने गजेन्द्रको पकड़ रखा था और वह अत्यन्त व्याकुल हो रहा था। जब उसने देखा कि आकाशमें गरुड़पर सवार होकर हाथमें चक्र लिये भगवान् श्रीहरि आ रहे हैं, तब अपनी सूँड़में कमलका एक सुन्दर पुष्प लेकर उसने ऊपरको उठाया और बड़े कष्टसे बोला—‘नारायण! जगद्गुरो! भगवन्! आपको नमस्कार है’॥ ३२॥✎ 6682030
सोऽन्तःसरस्युरुबलेन गृहीत आर्तो
दृष्ट्वा गरुत्मति हरिं ख उपात्तचक्रम्।
उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छ्रा-
न्नारायणाखिलगुरो भगवन् नमस्ते॥ ३२
सरोवरके भीतर बलवान् ग्राहने गजेन्द्रको पकड़ रखा था और वह अत्यन्त व्याकुल हो रहा था। जब उसने देखा कि आकाशमें गरुड़पर सवार होकर हाथमें चक्र लिये भगवान् श्रीहरि आ रहे हैं, तब अपनी सूँड़में कमलका एक सुन्दर पुष्प लेकर उसने ऊपरको उठाया और बड़े कष्टसे बोला—‘नारायण! जगद्गुरो! भगवन्! आपको नमस्कार है’॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.3.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 919) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/3/32/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)