श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.4.1

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

अथ चतुर्थोऽध्यायः

गज और ग्राहका पूर्वचरित्र तथा उनका उद्धार

श्रीशुक उवाच

तदा देवर्षिगन्धर्वा ब्रह्मेशानपुरोगमाः।

मुमुचुः कुसुमासारं शंसन्तः कर्म तद्धरेः॥ १

tadā devarṣigandharvā brahmeśānapurogamāḥ|

mumucuḥ kusumāsāraṃ śaṃsantaḥ karma taddhareḥ|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! उस समय ब्रह्मा, शंकर आदि देवता, ऋषि और गन्धर्व श्रीहरि भगवान्‌के इस कर्मकी प्रशंसा करने लगे तथा उनके ऊपर फूलोंकी वर्षा करने लगे॥ १॥

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