श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.4.12

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

आपन्‍नः कौञ्जरीं योनिमात्मस्मृतिविनाशिनीम्।

हर्यर्चनानुभावेन यद्गजत्वेऽप्यनुस्मृतिः॥ १२

āpannaḥ kauñjarīṃ yonimātmasmṛtivināśinīm|

haryarcanānubhāvena yadgajatve'pyanusmṛtiḥ|| 12

अर्थ

इसके बाद आत्माकी विस्मृति करा देनेवाली हाथीकी योनि उन्हें प्राप्त हुई। परन्तु भगवान्‌की आराधनाका ऐसा प्रभाव है कि हाथी होनेपर भी उन्हें भगवान्‌की स्मृति हो ही गयी॥ १२॥✎ 672 673

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #672 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #673 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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