श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.4.15

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

यथानुकीर्तयन्त्येतच्छ्रेयस्कामा द्विजातयः।

शुचयः प्रातरुत्थाय दुःस्वप्नाद्युपशान्तये॥ १५

yathānukīrtayantyetacchreyaskāmā dvijātayaḥ|

śucayaḥ prātarutthāya duḥsvapnādyupaśāntaye|| 15

अर्थ

इसीसे कल्याणकामी द्विजगण दुःस्वप्न आदिकी शान्तिके लिये प्रातःकाल जगते ही पवित्र होकर इसका पाठ करते हैं॥ १५॥✎ 674

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #674 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीहरिभगवान् ने → श्रीहरिभगवान्‌ने

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