श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.5.13

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

त्वया सङ्कथ्यमानेन महिम्ना सात्वतां पतेः।

नातितृप्यति मे चित्तं सुचिरं तापतापितम्॥ १३

tvayā saṅkathyamānena mahimnā sātvatāṃ pateḥ|

nātitṛpyati me cittaṃ suciraṃ tāpatāpitam|| 13

अर्थ

आप भक्तवत्सल भगवान्‌की महिमाका ज्यों-ज्यों वर्णन करते हैं, त्यों-ही-त्यों मेरा हृदय उसको और भी सुननेके लिये उत्सुक होता जा रहा है। अघानेका तो नाम ही नहीं लेता। क्यों न हो, बहुत दिनोंसे यह संसारकी ज्वालाओंसे जलता जो रहा है॥ १३॥✎ 680 681 682

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #680 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #681 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #682 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें