॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.5.26
ब्रह्मोवाच
अविक्रियं सत्यमनन्तमाद्यं
गुहाशयं निष्कलमप्रतर्क्यम्।
मनोऽग्रयानं वचसानिरुक्तं
नमामहे देववरं वरेण्यम्॥ २६
avikriyaṃ satyamanantamādyaṃ
guhāśayaṃ niṣkalamapratarkyam|
mano'grayānaṃ vacasāniruktaṃ
namāmahe devavaraṃ vareṇyam|| 26
अर्थ
ब्रह्माजी बोले—भगवन्! आप निर्विकार, सत्य, अनन्त, आदिपुरुष, सबके हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान, अखण्ड एवं अतर्क्य हैं। मन जहाँ-जहाँ जाता है, वहाँ-वहाँ आप पहलेसे ही विद्यमान रहते हैं। वाणी आपका निरूपण नहीं कर सकती। आप समस्त देवताओंके आराधनीय और स्वयंप्रकाश हैं। हम सब आपके चरणोंमें नमस्कार करते हैं॥ २६॥✎ 1367