श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.5.28

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

अजस्य चक्रं त्वजयेर्यमाणं

मनोमयं पञ्चदशारमाशु।

त्रिणाभि विद्युच्चलमष्टनेमि

यदक्षमाहुस्तमृतं प्रपद्ये॥ २८

ajasya cakraṃ tvajayeryamāṇaṃ

manomayaṃ pañcadaśāramāśu|

triṇābhi vidyuccalamaṣṭanemi

yadakṣamāhustamṛtaṃ prapadye|| 28

अर्थ

यह शरीर जीवका एक मनोमय चक्र (रथका पहिया) है। दस इन्द्रिय और पाँच प्राण—ये पंद्रह इसके अरे हैं। सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण इसकी नाभि हैं। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार—ये आठ इसमें नेमि (पहियेका घेरा) हैं। स्वयं माया इसका संचालन करती है और यह बिजलीसे भी अधिक शीघ्रगामी है। इस चक्रके धुरे हैं स्वयं परमात्मा। वे ही एकमात्र सत्य हैं। हम उनकी शरणमें हैं॥ २८॥

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