॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.5.32
पादौ महीयं स्वकृतैव यस्य
चतुर्विधो यत्र हि भूतसर्गः।
स वै महापूरुष आत्मतन्त्रः
प्रसीदतां ब्रह्म महाविभूतिः॥ ३२
pādau mahīyaṃ svakṛtaiva yasya
caturvidho yatra hi bhūtasargaḥ|
sa vai mahāpūruṣa ātmatantraḥ
prasīdatāṃ brahma mahāvibhūtiḥ|| 32
अर्थ
उन्हींकी बनायी हुई यह पृथ्वी उनका चरण है। इसी पृथ्वीपर जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज—ये चार प्रकारके प्राणी रहते हैं। वे परम स्वतन्त्र, परम ऐश्वर्यशाली पुरुषोत्तम परब्रह्म हमपर प्रसन्न हों॥ ३२॥