श्रुतियाँ कहती हैं कि चन्द्रमा उस प्रभुका मन है। यह चन्द्रमा समस्त देवताओंका अन्न, बल एवं आयु है। वही वृक्षोंका सम्राट् एवं प्रजाकी वृद्धि करनेवाला है। ऐसे मनको स्वीकार करनेवाले परम ऐश्वर्यशाली प्रभु हमपर प्रसन्न हों॥ ३४॥
सोमं मनो यस्य समामनन्ति
दिवौकसां वै बलमन्ध आयुः।
ईशो नगानां प्रजनः प्रजानां
प्रसीदतां नः स महाविभूतिः॥ ३४
श्रुतियाँ कहती हैं कि चन्द्रमा उस प्रभुका मन है। यह चन्द्रमा समस्त देवताओंका अन्न, बल एवं आयु है। वही वृक्षोंका सम्राट् एवं प्रजाकी वृद्धि करनेवाला है। ऐसे मनको स्वीकार करनेवाले परम ऐश्वर्यशाली प्रभु हमपर प्रसन्न हों॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.5.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 926) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/5/34/