श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.5.34

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

सोमं मनो यस्य समामनन्ति

दिवौकसां वै बलम२न्ध आयुः।

ईशो नगानां प्रजनः प्रजानां

प्रसीदतां नः३ स महाविभूतिः॥ ३४

somaṃ mano yasya samāmananti

divaukasāṃ vai balamandha āyuḥ|

īśo nagānāṃ prajanaḥ prajānāṃ

prasīdatāṃ naḥ sa mahāvibhūtiḥ|| 34

अर्थ

श्रुतियाँ कहती हैं कि चन्द्रमा उस प्रभुका मन है। यह चन्द्रमा समस्त देवताओंका अन्‍न, बल एवं आयु है। वही वृक्षोंका सम्राट् एवं प्रजाकी वृद्धि करनेवाला है। ऐसे मनको स्वीकार करनेवाले परम ऐश्‍वर्यशाली प्रभु हमपर प्रसन्‍न हों॥ ३४॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—मन्‍नमायुः।

    (मुद्रित पृष्ठ 926)
  2. ३

    प्रा० पा०—ब्रह्म महा०।

    (मुद्रित पृष्ठ 926)

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