श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.5.43

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

द्रव्यं वयः कर्म गुणान्विशेषं

यद्योगमायाविहितान्वदन्ति ।

यद् दुर्विभाव्यं प्रबुधापबाधं

प्रसीदतां नः स महाविभूतिः॥ ४३

dravyaṃ vayaḥ karma guṇānviśeṣaṃ

yadyogamāyāvihitānvadanti |

yad durvibhāvyaṃ prabudhāpabādhaṃ

prasīdatāṃ naḥ sa mahāvibhūtiḥ|| 43

अर्थ

पंचभूत, काल, कर्म, सत्त्वादि गुण और जो कुछ विवेकी पुरुषोंके द्वारा बाधित किये जानेयोग्य निर्वचनीय या अनिर्वचनीय विशेष पदार्थ हैं, वे सब-के-सब भगवान्‌की योगमायासे ही बने हैं—ऐसा शास्त्र कहते हैं। वे परम ऐश्‍वर्यशाली भगवान् हमपर प्रसन्‍न हों॥ ४३॥✎ 685

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #685 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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