॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.6.12
यथाग्निमेधस्यमृतं च गोषु
भुव्यन्नमम्बूद्यमने च वृत्तिम्।
योगैर्मनुष्या अधियन्ति हि त्वां
गुणेषु बुद्ध्या कवयो वदन्ति॥ १२
yathāgnimedhasyamṛtaṃ ca goṣu
bhuvyannamambūdyamane ca vṛttim|
yogairmanuṣyā adhiyanti hi tvāṃ
guṇeṣu buddhyā kavayo vadanti|| 12
अर्थ
जैसे मनुष्य युक्तिके द्वारा लकड़ीसे आग, गौसे अमृतके समान दूध, पृथ्वीसे अन्न तथा जल और व्यापारसे अपनी आजीविका प्राप्त कर लेते हैं—वैसे ही विवेकी पुरुष भी अपनी शुद्ध बुद्धिसे भक्तियोग, ज्ञानयोग आदिके द्वारा आपको इन विषयोंमें ही प्राप्त कर लेते हैं और अपनी अनुभूतिके अनुसार आपका वर्णन भी करते हैं॥ १२॥