श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.6.17

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

एक ए२वेश्‍वरस्तस्मिन्सुरकार्ये सुरेश्‍वरः।

विहर्तुकामस्तानाह स३मुद्रोन्मथनादिभिः॥ १७

eka eveśvarastasminsurakārye sureśvaraḥ|

vihartukāmastānāha samudronmathanādibhiḥ|| 17

अर्थ

परीक्षित्! समस्त देवताओंके तथा जगत‍्के एकमात्र स्वामी भगवान् अकेले ही उनका सब कार्य करनेमें समर्थ थे, फिर भी समुद्रमन्थन आदि लीलाओंके द्वारा विहार करनेकी इच्छासे वे देवताओंको सम्बोधित करके इस प्रकार कहने लगे॥ १७॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—एव वृतस्तस्मि०।

    (मुद्रित पृष्ठ 931)
  2. ३

    प्रा० पा०—समुद्रमथनादिभिः।

    (मुद्रित पृष्ठ 931)

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