श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.6.21

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

अमृतोत्पादने यत्नः क्रियतामविलम्बितम्।

यस्य पीतस्य वै जन्तुर्मृत्युग्रस्तोऽमरो भवेत्॥ २१

amṛtotpādane yatnaḥ kriyatāmavilambitam|

yasya pītasya vai janturmṛtyugrasto'maro bhavet|| 21

अर्थ

तुमलोग बिना विलम्बके अमृत निकालनेका प्रयत्न करो। उसे पी लेनेपर मरनेवाला प्राणी भी अमर हो जाता है॥ २१॥✎ 692

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #692 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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