श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.6.33

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

ततस्ते मन्दरगिरिमोजसोत्पाट्य दुर्मदाः।

नदन्त उदधिं निन्युः शक्ताः परिघबाहवः॥ ३३

tataste mandaragirimojasotpāṭya durmadāḥ|

nadanta udadhiṃ ninyuḥ śaktāḥ parighabāhavaḥ|| 33

अर्थ

इसके बाद उन्होंने अपनी शक्तिसे मन्दराचलको उखाड़ लिया और ललकारते तथा गरजते हुए उसे समुद्रतटकी ओर ले चले। उनकी भुजाएँ परिघके समान थीं, शरीरमें शक्ति थी और अपने-अपने बलका घमंड तो था ही॥ ३३॥✎ 694

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #694 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें