श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.7.17

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

मेघश्यामः कनकपरिधिः कर्णविद्योतविद्यु-

न्मूर्ध्नि भ्राजद्विलुलितकचः स्रग्धरो रक्तनेत्रः।✎ 1108

जैत्रैर्दोर्भिर्जगदभयदैर्दन्दशूकं गृहीत्वा

मथ्नन् मथ्ना प्रतिगिरिरिवाशोभताथो धृताद्रिः॥ १७

meghaśyāmaḥ kanakaparidhiḥ karṇavidyotavidyu-

nmūrdhni bhrājadvilulitakacaḥ sragdharo raktanetraḥ|

jaitrairdorbhirjagadabhayadairdandaśūkaṃ gṛhītvā

mathnan mathnā pratigiririvāśobhatātho dhṛtādriḥ|| 17

अर्थ

मेघके समान साँवले शरीरपर सुनहला पीताम्बर, कानोंमें बिजलीके समान चमकते हुए कुण्डल, सिरपर लहराते हुए घुँघराले बाल, नेत्रोंमें लाल-लाल रेखाएँ और गलेमें वनमाला सुशोभित हो रही थी। सम्पूर्ण जगत‍्को अभयदान करनेवाले अपने विश्‍वविजयी भुजदण्डोंसे वासुकिनागको पकड़कर तथा कूर्मरूपसे पर्वतको धारणकर जब भगवान् मन्दराचलकी मथानीसे समुद्रमन्थन करने लगे, उस समय वे दूसरे पर्वतराजके समान बड़े ही सुन्दर लग रहे थे॥ १७॥✎ 705

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #705 शब्दोंके बीचका स्थान: अजितभगवान् ने → अजितभगवान्‌ने
  • #1108 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): न्मू्र्ध्नि → न्मूर्ध्नि

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