॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.7.17
मेघश्यामः कनकपरिधिः कर्णविद्योतविद्यु-
न्मूर्ध्नि भ्राजद्विलुलितकचः स्रग्धरो रक्तनेत्रः।✎ 1108
जैत्रैर्दोर्भिर्जगदभयदैर्दन्दशूकं गृहीत्वा
मथ्नन् मथ्ना प्रतिगिरिरिवाशोभताथो धृताद्रिः॥ १७
meghaśyāmaḥ kanakaparidhiḥ karṇavidyotavidyu-
nmūrdhni bhrājadvilulitakacaḥ sragdharo raktanetraḥ|
jaitrairdorbhirjagadabhayadairdandaśūkaṃ gṛhītvā
mathnan mathnā pratigiririvāśobhatātho dhṛtādriḥ|| 17
अर्थ
मेघके समान साँवले शरीरपर सुनहला पीताम्बर, कानोंमें बिजलीके समान चमकते हुए कुण्डल, सिरपर लहराते हुए घुँघराले बाल, नेत्रोंमें लाल-लाल रेखाएँ और गलेमें वनमाला सुशोभित हो रही थी। सम्पूर्ण जगत्को अभयदान करनेवाले अपने विश्वविजयी भुजदण्डोंसे वासुकिनागको पकड़कर तथा कूर्मरूपसे पर्वतको धारणकर जब भगवान् मन्दराचलकी मथानीसे समुद्रमन्थन करने लगे, उस समय वे दूसरे पर्वतराजके समान बड़े ही सुन्दर लग रहे थे॥ १७॥✎ 705