praskannaṃ pibataḥ pāṇeryat kiñcijjagṛhuḥ sma tat|
vṛścikāhiviṣauṣadhyo dandaśūkāśca ye'pare|| 46
अर्थ
जिस समय भगवान् शंकर विषपान कर रहे थे, उस समय उनके हाथसे थोड़ा-सा विष टपक पड़ा था। उसे बिच्छू, साँप तथा अन्य विषैले जीवोंने एवं विषैली ओषधियोंने ग्रहण कर लिया॥ ४६॥
प्रस्कन्नं पिबतः पाणेर्यत् किञ्चिज्जगृहुः स्म तत्।
वृश्चिकाहिविषौषध्यो दन्दशूकाश्च येऽपरे॥ ४६
जिस समय भगवान् शंकर विषपान कर रहे थे, उस समय उनके हाथसे थोड़ा-सा विष टपक पड़ा था। उसे बिच्छू, साँप तथा अन्य विषैले जीवोंने एवं विषैली ओषधियोंने ग्रहण कर लिया॥ ४६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.7.46 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 941) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/7/46/