दैत्यो! कुत्ते और व्यभिचारिणी स्त्रियोंकी मित्रता स्थायी नहीं होती। वे दोनों ही सदा नये-नये शिकार ढूँढ़ा करते हैं॥ १०॥
सालावृकाणां स्त्रीणां च स्वैरिणीनां सुरद्विषः।
सख्यान्याहुरनित्यानि नूत्नं नूत्नं विचिन्वताम्॥ १०
दैत्यो! कुत्ते और व्यभिचारिणी स्त्रियोंकी मित्रता स्थायी नहीं होती। वे दोनों ही सदा नये-नये शिकार ढूँढ़ा करते हैं॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.9.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 948) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/9/10/