भगवान्ने अमृतका कलश अपने हाथमें लेकर तनिक मुसकराते हुए मीठी वाणीसे कहा—‘मैं उचित या अनुचित जो कुछ भी करूँ, वह सब यदि तुमलोगोंको स्वीकार हो तो मैं यह अमृत बाँट सकती हूँ’॥ १२॥✎ 718
ततो गृहीत्वामृतभाजनं हरि-
र्बभाष ईषत्स्मितशोभया गिरा।
यद्यभ्युपेतं क्व च साध्वसाधु वा
कृतं मया वो विभजे सुधामिमाम्॥ १२
भगवान्ने अमृतका कलश अपने हाथमें लेकर तनिक मुसकराते हुए मीठी वाणीसे कहा—‘मैं उचित या अनुचित जो कुछ भी करूँ, वह सब यदि तुमलोगोंको स्वीकार हो तो मैं यह अमृत बाँट सकती हूँ’॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.9.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 948) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/9/12/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)