॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.9.16
प्राङ्मुखेषूपविष्टेषु सुरेषु दितिजेषु च।
धूपामोदितशालायां जुष्टायां माल्यदीपकैः॥ १६
prāṅmukheṣūpaviṣṭeṣu sureṣu ditijeṣu ca|
dhūpāmoditaśālāyāṃ juṣṭāyāṃ mālyadīpakaiḥ|| 16
अर्थ
जब देवता और दैत्य दोनों ही धूपसे सुगन्धित, मालाओं और दीपकोंसे सजे-सजाये भव्य भवनमें पूर्वकी ओर मुँह करके बैठ गये, तब हाथमें अमृतका कलश लेकर मोहिनी सभामण्डपमें आयी। वह एक बड़ी सुन्दर साड़ी पहने हुए थी। नितम्बोंके भारके कारण वह धीरे-धीरे चल रही थी। आँखें मदसे विह्वल हो रही थीं। कलशके समान स्तन और गजशावककी सूँड़के समान जंघाएँ थीं। उसके स्वर्णनूपुर अपनी झनकारसे सभाभवनको मुखरित कर रहे थे॥ १६-१७॥✎ 719 720