॥ श्रीहरिः ॥
का त्वं कञ्जपलाशाक्षि कुतो वा किं चिकीर्षसि।
कस्यासि वद वामोरु मथ्नन्तीव१ मनांसि नः॥ ३
kā tvaṃ kañjapalāśākṣi kuto vā kiṃ cikīrṣasi|
kasyāsi vada vāmoru mathnantīva manāṃsi naḥ|| 3
अर्थ
‘कमलनयनी! तुम कौन हो? कहाँसे आ रही हो? क्या करना चाहती हो? सुन्दरी! तुम किसकी कन्या हो? तुम्हें देखकर हमारे मनमें खलबली मच गयी है॥ ३॥
का त्वं कञ्जपलाशाक्षि कुतो वा किं चिकीर्षसि।
कस्यासि वद वामोरु मथ्नन्तीव मनांसि नः॥ ३
‘कमलनयनी! तुम कौन हो? कहाँसे आ रही हो? क्या करना चाहती हो? सुन्दरी! तुम किसकी कन्या हो? तुम्हें देखकर हमारे मनमें खलबली मच गयी है॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.9.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 947) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/9/3/टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—मथ्नासीव।
(मुद्रित पृष्ठ 947)