श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.10.14

नवम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

न त्वां वयं जडधियो नु विदाम भूमन्२

कूटस्थमादिपुरुषं जगतामधीशम्।

यत्सत्त्वतः सुरगणा रजसः प्रजेशा

मन्योश्‍च भूतपतयः स भवान् गुणेशः॥ १४

na tvāṃ vayaṃ jaḍadhiyo nu vidāma bhūman

kūṭasthamādipuruṣaṃ jagatāmadhīśam|

yatsattvataḥ suragaṇā rajasaḥ prajeśā

manyośca bhūtapatayaḥ sa bhavān guṇeśaḥ|| 14

अर्थ

‘अनन्त! हम मूर्ख हैं; इसलिये आपके वास्तविक स्वरूपको नहीं जानते। जानें भी कैसे? आप समस्त जगत‍्के एकमात्र स्वामी, आदिकारण एवं जगत‍्के समस्त परिवर्तनोंमें एकरस रहनेवाले हैं। आप समस्त गुणोंके स्वामी हैं। इसलिये जब आप सत्त्वगुणको स्वीकार कर लेते हैं तब देवताओंकी, रजोगुणको स्वीकार कर लेते हैं तब प्रजापतियोंकी और तमोगुणको स्वीकार कर लेते हैं तब आपके क्रोधसे रुद्रगणकी उत्पत्ति होती है॥ १४॥✎ 2048

टिप्पणियाँ

  1. २

    नूनं।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 54)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2048 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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