श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.10.15

नवम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

कामं प्रयाहि जहि विश्रवसोऽवमेहं

त्रैलोक्यरावणमवाप्नुहि वीर पत्‍नीम्।

बध्नीहि सेतुमिह ते यशसो वितत्यै

गायन्ति दिग्विजयिनो यमुपेत्य भूपाः॥ १५

kāmaṃ prayāhi jahi viśravaso'vamehaṃ

trailokyarāvaṇamavāpnuhi vīra patnīm|

badhnīhi setumiha te yaśaso vitatyai

gāyanti digvijayino yamupetya bhūpāḥ|| 15

अर्थ

वीरशिरोमणे! आप अपनी इच्छाके अनुसार मुझे पार कर जाइये और त्रिलोकीको रुलानेवाले विश्रवाके कुपूत रावणको मारकर अपनी पत्‍नीको फिरसे प्राप्त कीजिये। परन्तु आपसे मेरी एक प्रार्थना है। आप यहाँ मुझपर एक पुल बाँध दीजिये। इससे आपके यशका विस्तार होगा और आगे चलकर जब बड़े-बड़े नरपति दिग्विजय करते हुए यहाँ आयेंगे, तब वे आपके यशका गान करेंगे’॥ १५॥✎ 2048

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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